पति पत्नी और वो की एक खफिनाक कहानी मटन सूप ने खोल दिया कत्ल का राज और चेहरे की अदला बदली

 


कई बार यह जिक्र होता है या कहा जाता है कि जो फ़िल्म है हम सभी देखते हैं। फ़िल्म में हमारे समाज का आईना होती। मतलब इसका मतलब जो होता है वही होता है कि जो कुछ हमारे इर्द गिर्द होता है हमारे समाज में हमारे आसपास कई बार वही चीज़ है, हम पर्दे पर देखते हैं, ये तो एक पहलू है। दूसरा बहुत सारे लोग ये भी कहते हैं, कई बार जो फिल्मी पर्दे पर देखते है, हम उसको अपनी जिंदगी, अपने समाज या अपने इर्दगिर्द? अपनाते और कई बार उसकी कॉपी करते हैं। क्राइम और क्राइम रिपोर्टिंग के बारे में हमेशा ये इलज़ाम लगता रहा है की जो क्राइम की खबरें होती हैं, क्राइम के शोज़ होते हैं। इनको देखकर बहुत सारे लोगों को आइडिआ जाते। कुछ हद तक सही है, लेकिन मैं हमेशा कहता हूँ कि क्राइम की खबरें क्राइम के शोध से कई बार ऐसा भी होता है कि लोग कहीं हादसे से बच जाते है क्योंकि वो अलर्ट हो जाते हैं। उन्हें पता चलता है कि किस किस तरीके से क्राइम हो सकता है, कैसे क्रिमिनल क्या कुछ कर सकता है। तो कुल मिलाकर ये दोनों पहलू है सिक्के के। अच्छा ई भी है तो बुराइ भी है और बुरा ई हैं तो अच्छा ही भी है। ये सारी चीजें हम इसलिए कह रहा हूँ की जो आज की कहानी है वह इसी बहस के इर्द गिर्द। एक फ़िल्म को देखकर। एक पूरे क्राइम का प्लॉट तैयार किया जाता है। असली ज़िंदगी? और उस फ़िल्म को कई बार देखा जाता है। ताकि कोई भी गलती ना रह जाए, कोई सबूत न छूट जाए। और फिर जो कुछ सोचा है, वैसे ही असली जिंदगी में अमल कर दिया जाए। प्लानिंग अपनी तरफ से पूरी अच्छी करने की कोशिश की गई। लेकिन बार बार यह कहा जाता है कि कहीं ना कहीं कोई सुराग। कोई सबूत जो मुजरिम हैं वो छोड़ ही देता है? ये कहानी एक पति, पत्नी और उस पत्नी के एक आशिक की है। कहानी की शुरूआत को अगर मैं दूसरे तरीके से शुरू करूँ तो ये। 27 नंबर नवंबर। 2017 27 नवंबर 2017 की कहानी। तेलंगाना में एक जगह है नगरकुरनूल नगरकुरनूल के एक प्राइवेट हॉस्पिटल में। 27 नवंबर 2017 को। एक शख्स को एक महिला। ले कर आती है। उस शख्स का चेहरा बुरी तरह से झुलसा हुआ था। चेहरा पहचान भी नहीं आ रहा था और उसको फ़ौरन एमर्जेंसी में ले जाया जाता है। डॉक्टर उसको देखते है, इलाज करते हैं। फिर पता चलता है कि जीस शख्स को लेकर आया गया उसका नाम है सुधाकर रेड्डी एक प्राइवेट कंपनी में अफसर है वो। और चेहरा बुरी तरह से झुलसा हुआ। सुधाकर रेड्डी के साथ जो महिला। पहुंची थी अस्पताल उसे लेकर उसका नाम था स्वाति रेड्डी स्वाति रेड्डी अस्पताल में लिखवाती है पेंशन के बारे में। सुधाकर रेड्डी नाम है। ये मेरे हस्बैंड हैं और किसी ने इनके ऊपर एसिड फेंका, तेजाब से हमला किया और इसलिए इनका चेहरा झुलस गया। इसके बाद इलाज शुरू होता है। धीरे धीरे सुधाकर रेड्डी की तबियत सुधरती जाती है लेकिन डॉक्टर फिर कहते हैं कि क्योंकि चेहरा बहुत ज्यादा झुलस चुका है एसिड से। तो अब। इनकी प्लास्टिक सर्जरी करनी होगी वापस इन्हें इनका चेहरा देने के लिए। प्लास्टिक सर्जरी का खर्च भी होता है। लेकिन स्वाति रेड्डी तैयार हो गई। उसने कहाँ की कोई बात नहीं, बस आप मेरे पति को ठीक कर दीजिए। इसके बाद स्वाति रेड्डी अपने घरवालों को और ससुराल वालों को इसकी खबर देती है कि उनके पति के साथ ऐसे हादसा हुआ है। कुछ लोगों ने अचानक उनके पति पर हमला किया, तेजाब फेंका और भाग गए और अब वो अस्पताल में हैं लेकिन खतरे से बाहर है। ठीक है, तमाम लोग अस्पताल पहुंचते हैं। जब पहुँचते हैं तो देखते है की सुधाकर रेड्डी के भाई माँ बाप के भी आते हैं और देखते हैं उनके बेटे का चेहरा जो है। वो पट्टियों से ढका हुआ। थोड़े दिन के बाद हालात सुधरती है। अब वो धीरे धीरे बात भी करता है लेकिन बात जो करता है वो थोड़ा सा लड़खड़ाकर। क्योंकि मुँह के इर्द गिर्द भी तेजाब ने अपना असर डाला था। तो बोली और आवाज क्लियर नहीं थी। लेकिन वो फिर भी बात कर रहा था और सामने वाले सुन रहे थे। इसके बाद वक्त और बीतता है। अब इसकी हालत सुधरती जाती है। अब डॉक्टर कहते हैं कि इसका पट्टी हटाएंगे, फिर हम प्लास्टिक सर्जरी करेंगे। कुछ वक्त के बाद अस्पताल में अब ये हो गया कि अभी तक। 

खाना वाना ठीक से खाया नहीं जा रहा था, मुँह खुल नहीं रहा था। तो फिर ये और की अब मुँह भी काम करने लगा। आप खाना खा सकते हैं पी सकते हैं। पहले लिक्विड डाइट था। तब धीरे धीरे वो अपना खाना पीना भी उसने शुरू कर दिया। अस्पताल में लेकिन पट्टी अभी भी चेहरे पर सलामत है। अब इसी दौरान घर वाले भी खाना बना बनाकर लेकर आने लगते हैं। सुधाकर रेड्डी को बचपन से मटन सूप बहुत पसंद था। खास तौर पर अपनी माँ के हाथ का। जब भी घर में कोई खास होता है, कोई खुशी का मौका होता है और माँ बाप भी सुधाकर को बहुत प्यार करते थे। यहाँ तक कि जब उसकी शादी हो गयी तब भी सुधाकर के लिए उसकी माँ जब भी पहुँचती, मटन सूप जरूर लाती और रोग अपनी माँ के हाथ का मटन सूप बहुत ज्यादा पसंद करता था। तब अस्पताल में जब हालत सुधारने लगी तो एक रोज़ माँ को खुशी हुई। उसने कहा चलो उनका बेटा अब खतरे से बाहर हैं। वापस जिंदगी मिली है तो बेटे को खुश करने के लिए उसका जो फ़ेवरेट मटन सूप हैं वो लेकर चलते हैं वो अस्पताल पहुँच जाती बेटे को मटन सूप देती है, बेटा मना कर देता। उन्हें लगता है कि शायद अभी मूड ठीक नहीं है बीमार है। बट वो काफी फोर्स करती है, तेरे भाई कहता है छोटा की भाई आपको तो बड़ा पसंद है। बट तमाम जिद और गुजारिश के बावजूद सुधाकर रेड्डी मटन सूप पीने को तैयार ही नहीं होता। यह बात माँ को तो इतनी बुरी नहीं लगती, उन्हें लगता है कि चलो ठीक हो जायेगा, उसके बाद पी लेगा, लेकिन छोटे भाई को कुछ डाउट होता है। उसे कहता है जो शख्स हर हाल में मटन सूप के पीछे पागल होता था, अपनी माँ के हाथ का आज इतना कहने के बावजूद और वो खाना खा रहा है, जूस पी रहा है, सब कुछ कर रहा है, मटन सूप क्यों नहीं पी रहा? उसके दिमाग में यह बात घर कर जाती है। लेकिन वो कुछ कहता नहीं है वहाँ से निकल लेता। अब धीरे धीरे वक्त बीतता है। और भी ठीक होने लगता है। क्योंकि तेजाब से। चेहरा जो है वो 30% से ज्यादा जल चुका था, झुलस चुका था तो चेहरा पहचान में नहीं आ रहा था और प्लास्टिक सर्जरी होनी थी। लेकिन उसके बाद अब वोट के चलने फिरने भी लगा। फैमिली वाले अस्पताल पहुँच रहे हैं। तो देखते हैं कि उसकी चाल में कुछ फर्क, फिर उसकी बातचीत एक हर इंसान की, अपनी हरेक की जिंदगी में, बल्कि एक इंसान का जो व्यक्तित्व होता पर्सनैलिटी वो सब डिफरेंट होती है। मेरी अलग होगी, आप लोगो की अलग होगी। तो उसे लगा की ये मेरे भाई का जो स्वभाव था जिसे बातें करता था, जैसे बैठता था, जैसे उठता था जैसे चलता था, जैसे हँसता था जैसे मुस्कुराता था। ये थोड़ा सा डिफरेंट लग रहा है। अब पता चला।



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