“असमान छपरा से आकाश तक: किसान-मजदूर का बेटा, ड्रोन मैन ऑफ़ इंडिया — राहुल सिंह की उड़ान”

 

                                           उत्तर प्रदेश के एक छोटे से गांव आसमान छपरा की धूल भरी गलियों में, जहां गरीबी की छाया हर घर पर मंडराती है, वहां एक छोटा सा बालक खेलता था। उसके कपड़े फटे हुए, पैरों में चप्पल नहीं, लेकिन आंखों में एक अजीब सी चमक थी।असमान छपरा की धूलमिट्टी में खेलते हुए उस बालक ने पहली बार आकाश की ओर देखा। वह आकाशजहाँ पक्षी बेख़ौफ़ उड़ते थे, जहाँ बादल बिना पूछे सफ़र करते थे और जहाँ से कभीकभी हेलीकॉप्टर की आवाज़ गाँव के सन्नाटे को चीरती हुई निकल जाती थी।वही आवाज़ उसके भीतर कोई डर नहीं जगाती थी, बल्कि एक चिंगारी सुलगा जाती थीसपने की चिंगारी। उस बालक का नाम था राहुल सिंह।

पिता संजय सिंहजो सुबह से शाम तक खेतों में हल चलाते, दूसरों के घर मजदूरी कर परिवार का पेट भरते थेशायद यह नहीं जानते थे कि उनका बेटा मिट्टी नहीं, हवा को जोतने की तैयारी कर रहा है।माँ श्रीमती रासमुनी देवीजो सीमित साधनों में भी घर को मुस्कान से थामे रहती थींयह नहीं जानती थीं कि उनकी कोख से जन्मा यह बालक एक दिन मशीनों को इंसानी संवेदना सिखाएगा।घर में पैसों की कमी थी,लेकिन हिम्मत की कोई कमी नहीं थी।राहुल का बचपन महंगे खिलौनों में नहीं,बल्कि कबाड़, तार, मोटर, बैटरी और टूटेफूटे सामान में बीता।जहाँ दूसरे बच्चे खेलते थे, वहाँ राहुल सवाल खोजता था—“यह चीज़ चलती क्यों है?”बिजली, यांत्रिकी, सेंसर, संचार प्रणालीये शब्द उसने किताबों में नहीं, जिंदगी से सीखे। स्कूल की पढ़ाई के साथसाथ उसने विज्ञान को अपने हालात से जोड़ लिया।गरीबी ने उसे रोका नहींउसने उसे मजबूत बनाया।

2017 में जब उसने पहली बार महाराजगंज महोत्सव की विज्ञान प्रदर्शनी में भाग लिया और द्वितीय पुरस्कार जीता, तभी यह साफ हो गया कि यह बालक साधारण नहीं है। इसके बाद उसकी मेहनत रंग लाने लगी। उसने इंडिया इंटरनेशनल साइंस फेस्टिवल (IISF) में लखनऊ और कोलकाता में हिस्सा लिया, डॉ. .पी.जे. अब्दुल कलाम जन्मदिवस पर सम्मान प्राप्त किया, नेशनल चाइल्ड साइंस कांग्रेस में जिला और राज्य स्तर पर प्रथम पुरस्कार जीते, तथा CSIR-CIMAP, रीजनल साइंस सिटी लखनऊ और गोरखपुर महोत्सव जैसे मंचों पर अपनी प्रतिभा दिखाई। फिर 2019 और 2020 में वह ऑल इंडिया स्तर पर प्रथम पुरस्कार जीतने लगा। ये जीतें केवल ट्रॉफियों की नहीं थीं; ये एक गरीब परिवार के बेटे की अथक मेहनत और लगन की जीत थीं।

जब दुनिया ड्रोन को महज मनोरंजन का साधन समझ रही थी, तब राहुल ने उसमें किसानों के लिए एक क्रांतिकारी समाधान देखासिंचाई की समस्या का हल, कम लागत वाली तकनीक और ग्रामीण भारत की आँख एवं हाथ। उसने लो-कॉस्ट ड्रोन बनाए, एनर्जी एफिशिएंट जनरेटर विकसित किए, बैटरी से चलने वाले कृषि यंत्र तैयार किए, कोरोना काल में सैनिटाइजिंग मशीनें बनाईं और घास काटने तथा खेत जोतने की मशीनें भी तैयार कीं। यह सब उसने उस समय किया जब वह अभी किशोरावस्था में था, जेब खाली थी, लेकिन दिल में गरीब किसानों की सेवा का अटूट जज़्बा भरा था।
जब राहुल ने मदन मोहन मालवीय यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्नोलॉजी, गोरखपुर में बीटेक में दाखिला लिया, तो घर-परिवार और समाज ने राहत की सांस ली—“अब तो लड़के की ज़िंदगी बन गई।लेकिन राहुल ने भीड़ से अलग सोचने का साहस दिखाया। उसने डिग्री के पीछे नहीं भागा; उसने ज्ञान, प्रयोग और नवाचार को तरजीह दी। वह बीटेक ड्रॉपआउट तो हो गया, मगर मेहनत, सीखने और सपनों से कभी ड्रॉपआउट नहीं हुआ।आज वह उत्तर प्रदेश विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद से संबद्ध डिज़ाइन इनोवेशन एवं इनक्यूबेशन सेंटर में एक सफल ड्रोन इनोवेटर के रूप में कार्य कर रहा है।
महाभारत में संजय दूर बैठकर युद्ध का पूरा दृश्य देख सकते थे। आज का यह संजय-पुत्रराहुल सिंहड्रोन के माध्यम से खेतों की लड़ाई, आपदा की चुनौतियाँ, स्वास्थ्य और सुरक्षा के मोर्चे केवल देखता है, बल्कि उनके समाधान भी देता है।जब वह ड्रोन उड़ाता है, तो वह केवल एक मशीन नहीं उड़ातावह उन अनगिनत बच्चों के सपनों को उड़ान देता है, जो आज भी किसी असमान छप्पर वाली झोपड़ी में मजदूरी, गरीबी और मजबूरी के बीच जी रहे हैं।

यह कहानी महज एक बीटेक ड्रॉपआउट की नहीं है, यह मेहनत, हिम्मत और खुद पर विश्वास की प्रेरक कहानी है। डिग्री रास्ता तो दिखा सकती है, लेकिन मंज़िल तक पहुँचाती हमारी मेहनत ही है। अगर हालात कमज़ोर हैं, तो सपनों को और मज़बूत बनाइए; अगर संसाधन नहीं हैं, तो अपनी सोच को ही सबसे बड़ा संसाधन बना लीजिए। राहुल सिंह आज उस नए भारत का प्रतीक बन चुके हैंजो गरीबी में जन्म लेकर भी उम्मीदों के पंख लगा लेता है। क्योंकि जहाँ हौसले ऊँचे हों, वहाँ आसमान भी छोटा पड़ जाता है। राहुल सिंह साबित करता है कि गरीबी कितनी भी गहरी हो, अगर हौसला हो तो आसमान छूना मुश्किल नहीं। यह भावुक कहानी हमें रुलाती भी है और प्रेरित भी करती है कि हर गरीब बच्चे तक यह संदेश पहुंचे – "तुम भी उड़ सकते हो!"

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