रितु गुप्ता: पोलियो की चुनौती को जीतकर शिक्षा की मशाल जलाने वाली एक सच्ची योद्धा

 

                                          जीवन में कई बार ऐसा मोड़ आता है जहाँ चुनौतियाँ इतनी बड़ी लगती हैं कि सपने टूटते हुए प्रतीत होते हैं। लेकिन असली जीत वही होती है जो हार मानने से इनकार कर दे। ऐसी ही एक भावुक और हृदयस्पर्शी प्रेरक कहानी है रितु गुप्ता कीइंदिरापुरम, गाजियाबाद की एक साहसी बहन, जो दिल्ली सरकार स्कूल में शिक्षिका हैं। मात्र 45 वर्ष की उम्र में 34 साल का शिक्षण अनुभव, पोलियो से प्रभावित दाहिना पैर, फिर भी उन्होंने कभी रुकना नहीं सीखा। वे सिर्फ़ बच्चों को पढ़ाती हैं, बल्कि जीवन जीने का हौसला भी देती हैं। रितु गुप्ता का जन्म सामान्य था, लेकिन छोटी उम्र में ही पोलियो ने उनके दाहिने पैर को प्रभावित कर दिया। समाज की नज़रों में यह एक कमज़ोरी थी, लेकिन रितु के लिए यह चुनौती बन गईएक ऐसी चुनौती जिसने उन्हें और मज़बूत बनाया। लोग कहते थे, "तुम्हारा पैर लंगड़ा है, क्या कर लोगी?" लेकिन रितु ने कभी इन बातों को दिल पर नहीं लिया। उन्होंने फैसला किया कि उनकी कमज़ोरी नहीं, उनकी मेहनत और इच्छाशक्ति दुनिया को दिखेगी।शिक्षा के क्षेत्र में कदम रखते हुए उन्होंने सिर्फ़ अपनी पढ़ाई पूरी की, बल्कि शिक्षक बनकर हजारों बच्चों के जीवन में रोशनी फैलाई। दिल्ली सरकार स्कूल में 34 वर्षों से वे बच्चों को हिंदी, सामाजिक अध्ययन और नैतिक मूल्यों की शिक्षा दे रही हैं। उनका मानना है कि शिक्षा सिर्फ़ किताबी ज्ञान नहीं, बल्कि आत्मविश्वास और हिम्मत का निर्माण है। अब एक और बड़ी खुशी! तुलसी हाई-फाई ग्लोबल अवॉर्ड सीजन 4 में सम्मानित होने जा रही हैं । रितु गुप्ता ने शिक्षा के अलावा पर्यावरण संरक्षण और फैशन शो के क्षेत्र में भी कई पुरस्कार जीते हैं। उन्होंने पर्यावरण जागरूकता कार्यक्रमों में सक्रिय भाग लिया, पेड़ लगवाए, और प्लास्टिक मुक्त अभियान चलाए। फैशन शो में भाग लेकर उन्होंने यह साबित किया कि विकलांगता सुंदरता या आत्मविश्वास की राह में बाधा नहीं बनती। उनके ये पुरस्कार बताते हैं कि एक महिला कितनी बहुमुखी हो सकती हैशिक्षिका, पर्यावरण योद्धा, और मॉडल!
शौक जो जीवन को रंगीन बनाते हैं :रितु का जीवन सिर्फ़ ड्यूटी तक सीमित नहीं। उनकी शौक सूची देखकर मन प्रफुल्लित हो जाता है:कविता लेखनवे भावुक कविताएँ लिखती हैं जो दर्द को शक्ति में बदल देती हैं।
दूसरों की मददगरीब बच्चों को मुफ्त ट्यूशन, विकलांगों को हौसला देना, उनकी दिनचर्या का हिस्सा है।
पुस्तकें पढ़नाप्रेरक किताबें और साहित्य उन्हें नई ऊर्जा देते हैं।
संगीत संगीत सुनना और गुनगुनाना उनके तनाव का सबसे अच्छा इलाज है।
ये शौक उन्हें संतुलित जीवन जीने में मदद करते हैं। वे कहती हैं, "जब पैर थक जाता है, तो दिल और दिमाग को संगीत और कविता से आराम मिलता है।रितु गुप्ता की कहानी हमें सिखाती है कि पोलियो या कोई भी विकलांगता आपको रोक नहीं सकती, अगर आपके अंदर जुनून हो। वे कहती हैं, "मेरा पैर लंगड़ा हो सकता है, लेकिन मेरी सोच कभी नहीं रुकी। मैं बच्चों को बताती हूँसपने देखो, मेहनत करो, और कभी हार मत मानो।"आज जब वे क्लासरूम में खड़ी होती हैं, बच्चे उन्हें सिर्फ़ टीचर नहीं, बल्कि एक जीवंत प्रेरणा मानते हैं। उनकी मुस्कान में दर्द छिपा है, लेकिन आँखों में जीत की चमक है।रितु गुप्ताएक साधारण नाम, लेकिन असाधारण कहानी। अगर आप भी जीवन की किसी चुनौती से जूझ रहे हैं, तो उनकी कहानी याद रखिए। क्योंकि असली बहादुरी पैरों में नहीं, दिल में होती है।

 

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