पारंपरिक
ज्ञान को आधुनिक आवश्यकताओं
से जोड़ने वाले विद्वान आचार्य रामप्रसाद शास्त्री जी का जीवन
निष्ठा, साधना और निरंतर सेवा
का अनुपम उदाहरण है। ज्योतिष वास्तु आयु निर्णय, मार्केश एवं असाध्य रोगों की जाँच-पड़ताल,
महामृत्युंजय (मृतसंजीवनी विद्या) अनुष्ठान, संगीतमय यज्ञ, पारंपरिक देव प्रतिष्ठा, वेद-पुराण कथा प्रवक्ता तथा प्रेतबाधा व पितृदोष निवारण
के विशेषज्ञ के रूप में
वे देशभर में सम्मानित हैं।इटावा ब्लॉक के रनो दिया
गांव (कोटा, राजस्थान) में उच्चवर्गीय सनाढ्य ब्राह्मण अवस्थी गोत्र के मध्यम कृषक
परिवार में जन्मे शास्त्री जी का परिवार
राजस्थान के प्रसिद्ध राजगुरु
एवं राजज्योतिषी वंश से जुड़ा हुआ
है। पिता श्री उमाशंकर शर्मा और माता श्रीमती
केदारी बाई के संस्कारों ने
उन्हें प्रारंभ से ही विद्या,
कर्मकांड और सेवा का
मार्ग दिखाया।
शास्त्री
जी ने राजस्थान विश्वविद्यालय,
जयपुर से 1987 में शिक्षा शास्त्री (B.Ed.) प्राप्त की। महर्षि दयानंद सरस्वती विश्वविद्यालय, अजमेर से साहित्य में
स्नातकोत्तर (1997) किया। हिंदी साहित्य सम्मेलन, इलाहाबाद से 1986 (संवत् 2043) में आयुर्वेदरत्न उपाधि प्राप्त की। ज्योतिष की गहन शिक्षा
उन्होंने पंडित
श्यामनंदन मिश्र और
काशी हिंदू विश्वविद्यालय के प्रो. रामचंद्र
पाठक से प्राप्त की। 1980 से संस्कृत
अध्यापन शुरू कर 2016 में राजस्थान शिक्षा विभाग से सेवानिवृत्त हुए।
उन्होंने ज्योतिष वास्तु अनुसंधान संस्थान, इटावा राजस्थान की स्थापना कर
ज्ञान के प्रचार-प्रसार
में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
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शास्त्री
जी को वर्ष 2005 में
ओडिशा के पुरी में
आयोजित 10वीं इंटरनेशनल एस्ट्रोलॉजिकल ग्लोबल रिसर्च कॉन्फ्रेंस में “भारत जगन्नाथ भास्कर” सम्मान से स्वर्ण पदक
सहित Indian Great
Astrologer Award प्रदान
किया गया। अखिल भारतीय ज्योतिष वास्तु महासम्मेलन ने उन्हें Lifetime Achievement Award से सम्मानित किया।
उपखंड कार्यालय, इटावा से प्रशस्ति पत्र
प्राप्त करने वाले शास्त्री जी को 25 वर्षों
के समृद्ध अनुभव के आधार पर
Emerging Achievers Award Council द्वारा ज्योतिष क्षेत्र में Honorary Doctorate की उपाधि तथा
Lifetime Membership से
नवाजा गया। शास्त्री जी देव प्रतिष्ठा
एवं यज्ञ को संगीत के
साथ प्रस्तुत करने वाले भारत के प्रथम विद्वान
हैं। उनके द्वारा निर्धारित मुहूर्त, अनुष्ठान और यज्ञ शत-प्रतिशत फलदायी सिद्ध होते हैं। घर, फैक्ट्री, उद्योग एवं संस्थानों के वास्तु विजिट,
शिलान्यास, गृहप्रवेश तथा नूतन मूर्ति प्राण-प्रतिष्ठा उनके द्वारा अत्यंत प्रभावी ढंग से संपन्न किए
जाते हैं।
श्री सिद्ध
शक्तिपीठ शनिधाम ट्रस्ट, नई दिल्ली के संस्थापक परमहंस दाती महाराज जी से हाल ही में
भेंट करने पर उन्होंने आचार्य रामप्रसाद शास्त्री जी की विद्वता, अनुभव और सेवा भावना
की खुलकर प्रशंसा की तथा आशीर्वाद प्रदान किया। शास्त्री जी स्वयं इस प्रतिष्ठित ट्रस्ट
के कोटा मंडल के वरिष्ठ उपाध्यक्ष भी हैं। गो-सेवा, ब्राह्मण सेवा, गरीबों एवं संतों की निःस्वार्थ सेवा
के लिए वे “सेवार्थी”
के नाम से प्रसिद्ध हैं।
रामकथा, शिव पुराण, देवी भैरव कथा, श्रीमद् भागवत कथा (मोक्ष यज्ञ) के प्रवक्ता के
रूप में भी वे जन-जन तक पहुँचते
हैं।आचार्य रामप्रसाद शास्त्री जी का जीवन
सिखाता है कि सच्ची
विद्या, निष्ठा और सेवा भावना
से व्यक्ति न केवल स्वयं
को उन्नत करता है बल्कि पूरे
समाज को प्रेरणा भी
देता है। उनके अनुभव, सम्मानों और समर्पण से
युवा पीढ़ी को प्रेरणा मिलती
है कि प्राचीन भारतीय
ज्ञान-विज्ञान आज भी प्रासंगिक
और शक्तिशाली है।