26 अगस्त 2026 को
नेपाल-तिब्बत (चीन) सीमा के पास ग्लेशियर/बर्फ-चट्टान के पतन से भोटेकोशी और
त्रिशूली नदियों में विनाशकारी फ्लैश फ्लड आया। इसने उत्तरी और मध्य नेपाल
के कई जिलों (रसुवा,
नुवाकोट, चितवन, नवलपरासी, धादिंग, गोरखा, तनहूं आदि) में भारी तबाही मचाई।
मौजूदा आंकड़े
(सबसे
हालिया
रिपोर्ट्स
के
अनुसार)
मृतक: नेपाल में लगभग 1,200 से 1,243 (कुछ रिपोर्ट्स में 1,222–1,243 तक)। तिब्बत
(चीन) साइड पर 16–21 मौतें।
लापता: नेपाल में लगभग 4,000 से 4,875 (जिनमें करीब 583 विदेशी नागरिक शामिल)। चीन साइड
पर ~540 लापता।
बचाए गए:
11,000 से ज्यादा (कुछ रिपोर्ट्स में ~11,993)। सुरक्षा बलों
ने हजारों लोगों को हेलीकॉप्टर और
जमीनी रास्तों से निकाला।
प्रभावित
जिलों में चितवन से सबसे ज्यादा
शव बरामद हुए (348 के आसपास), उसके
बाद नवलपरासी पूर्व/पश्चिम, नुवाकोट आदि।
बारिश
जारी रहने और मलबे के
कारण खोज-बचाव धीमा हो रहा है।
कई परिवार लापता प्रियजनों के लिए प्रतीकात्मक
अंतिम संस्कार कर रहे हैं।
बचाव अभियान
की
स्थिति:
मुख्य
फोकस हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट्स के टनल और
अंडरग्राउंड पावरहाउस पर है, जहां
सैकड़ों मजदूर फंसे होने की आशंका है
(कुछ रिपोर्ट्स में 600+ अभी भी लापता/फंसे)। भारत, चीन
और अन्य देशों की विशेषज्ञ टीमों
के साथ नेपाली सेना और पुलिस काम
कर रही है। कुछ टनल में हवा/भोजन की सुविधा होने
से जीवित बचे होने की उम्मीद जताई
जा रही थी, लेकिन समय बीतने के साथ उम्मीदें
कम हो रही हैं।
कुल
सुरक्षा कर्मी: 20,000+ तैनात। भारी मशीनरी, हेलीकॉप्टर और खुदाई का
काम चल रहा है।
अज्ञात
शवों की पहचान के
लिए DNA सैंपल और वेबसाइट पर
डिटेल्स अपलोड किए जा रहे हैं।
कई शवों का पोस्टमॉर्टम पूरा
हो चुका है।
नुकसान और
राहत:
बुनियादी
ढांचा: कई हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट्स
क्षतिग्रस्त (नेपाल की बिजली उत्पादन
का करीब 10% प्रभावित, सैकड़ों मेगावाट क्षमता बाधित)। दर्जनों पुल
(सस्पेंशन और मोटरेबल) बह
गए/क्षतिग्रस्त। सड़कें और गांव तबाह।
UNDP के अनुसार लाखों टन मलबा। पुनर्निर्माण
के लिए अरबों डॉलर की जरूरत बताई
जा रही है।
विस्थापित:
हजारों लोग अस्थायी शिविरों (स्कूल आदि) में। रोग फैलने का खतरा (दूषित
पानी, मानसून)।
राहत:
भारत ने दवाइयां और
रेस्क्यू टीम भेजी। यूएन, अन्य देश और अंतरराष्ट्रीय एजेंसियां
मदद कर रही हैं।
प्रधानमंत्री बालेन्द्र शाह ने जलवायु परिवर्तन
से जोड़ते हुए अंतरराष्ट्रीय समुदाय से सहयोग की
अपील की। टेलीकॉम सेवाएं ज्यादातर बहाल। यह
आपदा जलवायु परिवर्तन के बढ़ते खतरे
का उदाहरण बताई जा रही है।
खोज-बचाव का 8वां-9वां दिन चल रहा है।
बारिश और पहुंच की
कठिनाई से ऑपरेशन प्रभावित।
नेपाल
की इस भीषण त्रासदी
ने हमें एक बार फिर
याद दिलाया है कि प्रकृति
कितनी शक्तिशाली है, लेकिन इंसानियत उससे भी ज्यादा मजबूत
है। हजारों जिंदगियां छिन गईं, परिवार बिखर गए, सपने टूट गए… फिर भी बचाव टीमों
की रात-दिन की मेहनत, पड़ोसी
देशों की मदद, और
आम लोगों का सहयोग यह
साबित करता है कि अंधेरे
में भी रोशनी जरूर
होती है।यह सिर्फ नेपाल की लड़ाई नहीं,
पूरी मानवता की लड़ाई है।
जलवायु परिवर्तन के खिलाफ हमें
अब एकजुट होना होगा, ताकि भविष्य में कोई और परिवार इस
दर्द से न गुजरे।
“जब पानी
की दीवारें सब कुछ बहा
ले जाएं, तब भी इंसानियत
की किरणें नहीं बुझतीं। नेपाल के पहाड़ों में
आज दर्द है, लेकिन साथ में अटूट हिम्मत भी है। जो
बच गए, वे फिर से
खड़े होंगे। जो चले गए,
उनकी यादें हमें बेहतर इंसान बनने की प्रेरणा देंगी।
आइए, इस मुश्किल घड़ी
में नेपाल के साथ खड़े
हों – प्रार्थना से, मदद से, और इस संकल्प
से कि हम धरती
की रक्षा करेंगे, ताकि कोई और माँ अपने
बच्चे को यूं न
खोए। आशा कभी नहीं मरती… और हम सब
मिलकर इस आशा को
जिंदा रखेंगे।
