जिसके दिल में राम बसे हैं वह परम सौभाग्य है रामसेतु

 

आप कभी गए हो वही यार एशिया का सबसे भूतिया अकेला है जिसमें इंसान के अलावा कोई और भी रहता है, गए हो या नहीं, लेकिन एक खतरनाक बोर्ड के बारे में जरूर सुना होगा। सूरज निकलने के बाद और सूरज निकलने से पहले इसके लिए मैं घुसना साफ मना है। ये बोर्ड लगाया किसने सरकार ने है ना और साफ बोलू एएसआइ गवर्नमेंट की वो एजेंसी जो हिस्टोरिकल मोनुमेंट्स और खुद हिस्टरी, दोनों की रक्षा करती है रामसेतु ये है वो हिस्टरी इतिहास जीसको एएसआइ ने आज तक बचा के रखा है, एकदम सीक्रेट तरीके से नॉर्मल लोगों से बिल्कुल छुपाके लेकिन क्या अक्षय एंड कंपनी इस बार दुनिया के सामने कुछ ऐसा लेकर आएँगे जिसके बारे में कोई नहीं जानता? कहानी भगवान वैसे साइंस की है जिसके बीच में इस बार बेचारा रामसेतु फंस गया है। साइंस के फॉलोअर्स मानते हैं। पुराना पुल तोड़कर विकास लेकर आई है डेवलपमेंट कहा सुनी सुनाई बातों में फंसे हुए हैं तो फिर उनका क्या होगा? जिनका दुनिया में बस एक काम दिन रात बोलो जय जय श्री राम जय जय श्री राम कौन सच्चा कौन झूठा किसकी बातों पर करें भरोसा? फैसला करने ऐसी खुद लड़ाई में कूद पड़ता है लिटरल्ली ये भाई साहब पानी में कूद पड़े हैं। 300 फिट गहराई में जाकर 7000 साल पुराने राम और उनके सेतु का सच पता लगाने, लेकिन कहानी में ट्विस्ट तब आता है आप जानते हो जब इंडिया का बॉर्डर क्रॉस हो जाता है और लंका का इतिहास जाता है और श्रीराम को ढूंढ़ते हुए फ़िल्म में खुद्द स्तर वाले रावण की एंट्री होती है। देखो बहुत रामसेतु का कॉन्सेप्ट बड़ा मजेदार है। एक तरफ हिस्टरी वर्सिस माइथोलॉजी चल रहा है तो दूसरी तरफ साइनस वर्सिस फिक्शन एक तीर से दो निशाने है, लेकिन सिर्फ दिमाग में सोच लेने से तो फ़िल्म नहीं बन जाती। उसको स्क्रीन पर दिखाना चाहिए। एग्री करते होना इस बात से इससे पहले जिसे कार्तिकेय टू आई थी, उसका टॉपिक और राम सेतु का टॉपिक एक दूसरे से काफी मैच करता है, लेकिन कार्तिकेय टू एड्वेंचर की तरफ मुड़ गई और यह रामसेतु पॉलिटिक्स ऐंड रिलिजन को ज्यादा फोकस में डालती है। सिंपल शब्दों में बोलू राम सेतु के पास मौका था एक ऐसा लाइफ टाइम एक्सपिरियंस क्रिएट करने का जो इंडियन सिनेमा की शक्ल बदल कर रख देता, लेकिन 40 दिन का चक्कर बाबूभैया 40 दिन बाद दूसरी फ़िल्म की शूटिंग भी तो करनी है। सिर्फ एक फ़िल्म तो मेहनत करेंगे तो लक्ष्मीजी बुरा मान जाएगी। इस सीन को आप गौर से देखो सिर्फ कुछ सेकेंड में शरीर के अंदर बिजली दौड़ने लगती है। है न वहाँ तो सिर्फ कैरेक्टर का नाम राम था, तब इतना जबरदस्त इम्पैक्ट डाल दिया। ऐसा ही कोई सीन पूरे ढ़ाई घंटे में राम सेतु के अंदर ढूंढ़ते रह गई। लेकिन मेकर्स एकदम ऐवरेज एंड से फ़िल्म बना के थक गए। जबकि आपकी फ़िल्म का तो टॉपिक ही श्रीराम है। कार्तिके टू में हिम्मत थी उन्होंने श्रीकृष्ण को फ़िल्म के अंदर प्रेज़ेंट भी किया। वो इस बात को माइथोलॉजी नहीं, सच मानते हैं। बट साइड ली। रामसेतु ने वो हिम्मत नहीं दिखाई। इसके बाद उमा तो मैं फ़िल्म को खत्म कर दिया। अरे एक सेकंड के लिए सही श्रीराम को फ़िल्म के अंदर लेकर तो आते हैं, वो सच है। हम मानते हैं आप डर क्यों गए? चलो ये सब तो हमारी फीलिंग्स है। फंगल सिनेमा के चश्मे से भी जज करोगे तो राम से तो एक जबरदस्ती लंबी खींची गई नॉट सो इंट्रेस्टिंग टाइप की फ़िल्म है। ट्रेलर में जब इस रोबोट को पानी के अंदर उतरते हुए मैंने देखा था तब ना जाने कितने सपने सजा लिए थे लेकिन फ़िल्म के अंदर उसका ज़रा सा भी इस्तेमाल नहीं हुआ। सिर्फ एक सीन में निपटा दिया। फ़िल्म से साइंस वाले ऐंगल तो आप हटा ही दो। ये लोग पूरी फ़िल्म सिर्फ इस एक सीन के दम पर चलाना चाहते हैं लेकिन जब वो सीन आता है, उससे जुड़े हुए हैं। बाहर ही नहीं निकलते क्योंकि फ़िल्म की कहानी इतनी स्ट्रांग है ही नहीं की आप उसके साथ जुड़ जाओ। पर्सनली अक्षय कुमार इस फ़िल्म में भी सिर्फ एग्ज़िट कर रहे हैं। वो स्टैंड आउट नहीं कर पाए। रामसेतु सिर्फ टॉपिक की वजह से इंट्रेस्टिंग है। ये अक्षय कुमार की फ़िल्म बिल्कुल नहीं है। एक्टिंग करने के लिए ज्यादा कुछ था नहीं। उनके पास बिल्कुल सिंपल और सरल तरीके से लिखा गया कैरेक्टर है उनका ना कॉमेडी, ना ट्रैजिडी से फ्लैट फेस जैकलीन और नुसरत बस ये एहसास दिलाने के लिए फ़िल्म में मौजूद है की वो भी बॉलीवुड का हिस्सा है प्लीज़ हमें भूल मत जाइएगा। इसके अलावा इन दोनों का कैरेक्टर अगर आप हटा भी दोगे तो फ़ोन पे ज्यादा कुछ असर नहीं पड़ेगा। हाँ, लेकिन फ़िल्म में एक छुपा हुआ सरप्राइज़ है। कोई छोटा टैलेंट बहुत बड़ा सत्यदेव बस ये फ़िल्म को देखने लायक बनाते हैं। इनके कैरक्टर के साथ एक ट्विस्ट भी है तो बॉस रामसेतु जो बन सकती थी, वैसे बिल्कुल नहीं है। अपॉर्चुनिटी वेस्टेड ऐसे सब्जेक्ट से बहुत रिसर्च करना पड़ता है और फ़िल्म के ऐक्टर्स को टाइम देना पड़ता है। 40 दिन में कुछ नहीं होने वाला, बस ये अकेला फोटो देख लो। इसको देखकर जो आप फील कर रहे हो वो पूरी ढ़ाई घंटे की फ़िल्म में एक बार भी नहीं होगा। आपको बस यहाँ फ़िल्म डूब गई। श्रीराम सिर्फ एक टॉपिक नहीं है, वो एक जिम्मेदारी है मेरी तरफ से राम सेतु को पांच में से दो स्टार्स पहला कॉन्सेप्ट साइज वर्सिस फेथ एंड मैथोलॉजी वर्सिस हिस्टरी। एक ही फ़िल्म के अंदर कमाल की सोच और दूसरा सत्यदेव का स्क्रीन प्रेजेंस प्लस बैकग्राउंड में राम वाला म्यूसिक। ये दो चीजों ने मूड खराब होने से बचा लिया नेगेटिव ने। पहला तो सिर्फ बातों से चीज़ो को समझाना भाई फ़िल्म देखने के लिए होती है सुनने के लिए नहीं। दूसरा अक्षय का ओवर सिंपलीफाइड कैरेक्टर कोई ट्विस्ट नहीं, कोई फीलिंग नहीं एकदम फ्लैट और नुशरत जैकलीन दोनों को जबरदस्ती स्क्रिप्ट में घुसाना। तीसरा स्टार कटेगा रामसेतु मैं खुद राम का मौजूद न होना एक सीन तो बनता था, जिसमें श्रीराम को आप स्क्रीन पर लाते, वो नहीं आये तो फीलिंग नहीं आयी। फ़िल्म देखो, बाहर निकलो और सब कुछ भूल जाओ ।

और नया पुराने