स्व.सुरजीत सिंह "जोबन" बहुभाषी भारतीय समाज की एकता के प्रतीक

 


सरदार सुरजीत सिंह ' जोबन 'जी की आज अंतिम अरदास गुरुद्वारा गुरु नानक प्याऊ साहिब ,दिल्ली में हुई। मैं और डॉ.जय सिंह आर्य जी उसमें शामिल होने साथ गए।बहुत से राजनीतिक,धार्मिक और सामाजिक संस्थाओं के प्रमुख और जोबन जी के प्रशंसक शामिल थे।लंगर के बाद लौटते समय उनके बड़े पुत्र वरिंदर (सोनू)से मिला तो उन्होंने मेरे कंधे पर हाथ रखकर कहा -

"अखिलेश जी,पिताजी की स्मृतियों को सहेजकर रखना।भूलना मत।"इतना कहकर उनकी आंखें भर आईं।

मैं भी उदास हो गया।रह रहकर जोबन जी की गोष्ठियां,पाऊंटा साहिब,हिमाचल की यात्रा और वहां की घटनाएं याद आती रहीं।

कब मैंने जूताघर से जूते लिए,पार्किंग में आया,बाहर निकला पता ही नहीं चला।जो बुलेट बाईक आते समय फूल की तरह हल्की लग रही थी वापसी में बहुत भारी लग रही थी,मानों उसे मैं ही खींच रहा हूं।पीछे बैठे डॉ.जय सिंह आर्य जी मेरे कंधे ठोककर दाएं या बाएं मुड़ने का निर्देश दे रहे थे।आज उल्टे सारथी को रथी रास्ता बता रहा था।अक्सर रास्ते भर आर्य जी से साहित्यिक चर्चा करने वाले ने उनसे सिर्फ इतना पूछा कि जोबन का अर्थ यौवन अर्थात जवानी ही होता है न?

सरदार सुरजीत सिंह ' जोबन ' को मंच पर अक्सर चिरयुवा कहकर हम लोग छेड़ते थे।वह हंसकर हामी भी भरते थे।पिछले कुछ महीनों से या यूं कहें कि कोविड़ काल से उनसे मिलना नहीं हो पाया था।कुछ दिनों से वह बीमार रहते थे।

वह चिरयुवा कब बूढ़ा हुआ और कब काल के गाल में समा गया यह पता ही न चला। आज उनकी अंतिम अरदास भी हो गई।

जोबन जी को मैंने पहली बार जनकपुरी में एक साहित्यिक कार्यक्रम में बोलते सुना था।वह उस समय हिंदी अकादमी,दिल्ली सरकार के सदस्य थे।उनका ओजस्वी भाषण सुनकर मैं बहुत प्रभावित हुआ था।कार्यक्रम में दिल्ली के  मेयर भाजपा नेता श्री पृथ्वीराज साहनी ने मुझे विक्रमशिला विद्यापीठ से आया मेरा "विद्या वाचस्पति "की उपाधि का प्रमाणपत्र दिया था।जिसके सूत्रधार आदरणीय श्री विनोद बब्बर जी और श्री किशोर श्रीवास्तव जी थे जो कार्यक्रम में भी उपस्थित थे।

कार्यक्रम के बाद जोबन जी से मुलाकात और बातचीत हुई।मोबाइल नंबरों का आदान - प्रदान हुआ।

कुछ दिनों बाद मैं जोबन जी से मिलने उनके घर गया।इंद्रलोक जो कि व्यवसायिक इलाका और मुस्लिम बाहुल्य वाला क्षेत्र है,वहां जोबन जी की सामाजिक धाक के मुझे प्रत्यक्ष दर्शन हुए।इंद्रलोक  की प्रसिद्ध मस्जिद के पास पता पूछने के लिए रुका।एक दुकानदार से उनके घर का पता पूछा।वह कुछ अटपटाया।मैंने नाम बताया तो वह हंसते हुए बोला -

"भाई,इस इलाके में उनका नाम ही बहुत है।पता पूछने की जरूरत नहीं है।"

उसने इशारे से रोड़ पर सीधे जाकर फिर मुड़ने का इशारा किया।कुछ दूर चलकर एक मोड़ मिला तो फिर किसी से उनका नाम पूछा।उसने नाम सुनते ही एक गली में मुड़ने का इशारा कर दिया। मैंने महसूस किया कि सिर्फ किताबी दुनिया में नाम रोशन करने वाले बहुत से नामी लोगों को एक गली और मुहल्ले से बाहर स्थानीय लोग नहीं जानते।जोबन जी की ख्याति आसपास होने का सीधा अर्थ था उनका सामाजिक जुड़ाव।रचनाकार जितना अधिक समाज से जुडा होगा उसकी रचनाओं में समाज उतनी ही मुखरता से प्रतिध्वनित होगा।जो जोबन जी की रचनाओं में प्रत्यक्ष झलकता था।

जोबन जी मुझे देखते ही खिलखिला पड़े।मुझे सीने से लगाकर बोला -

"अच्छा भला मानस है,खामखां अकेला लिखता है।तेरे साथ तो काफिला है।"इतना कहकर उन्होंने मेरी पीठ पर एक धौल जमाई और गली में ही कुर्सियां डालकर बैठ गए।आसपास के दुकानदार मुझे उनका अतिथि समझकर नमस्कार करने लगे।जलपान हुआ और बहुत सी बातें भी।उन्होंने मुझे अपनी कुछ कृतियां भेंट की।जिसमें महाभारत के सुप्रसिद्ध पात्र पितामह भीष्म पर खंड काव्य भी था।मुझे आश्चर्य भी हुआ।उन्होंने बताया कि रामायण और महाभारत को उन्होंने पढ़ा है और उनके बहुत से पात्रों पर लिखना चाहता हूं।यह उनकी धार्मिक सदभावना और साझी विरासत को जीवित रखने की प्रबल इच्छाशक्ति रखने वाले जीवंत भाव था।

उनसे फोन पर अक्सर बातचीत होती।एक बार उनके घर के पास ही काव्यगोष्ठी हुई।गोष्ठी में एक व्यक्ति स्कूटर से आया और उनको प्रणाम करके उनकी बगल में बैठ गया।कुछ देर बाद उसको एक फूलमाला पहनाई गई तो परिचय हुआ कि वह आम आदमी पार्टी का नवनियुक्त विधायक है। उस समय पहली बार आम आदमी पार्टी दिल्ली में विधानसभा चुनाव लड़ी थी।जोबन जी खुद कांग्रेस की नेता और दिल्ली में बहुत दिनों तक मुख्यमंत्री रहीं श्रीमती शीला दीक्षित जी के नजदीक थे।कई बार हिंदी अकादमी दिल्ली का उन्हें उपाध्यक्ष बनाए जाने की भी चर्चाएं हुई थीं।लेकिन जोबन जी राष्ट्रवादी संगठनों और उनके संगठनों से जुड़े कवियों से भी प्रगाढ़ रिश्ते रखते थे।श्रीमान बब्बर जी और आर्य जी इसके प्रत्यक्ष उदाहरण हैं।

हमारे रिश्ते और प्रगाढ़ होते गए। वह सिक्ख समुदाय से होते हुए भी भारत के बहुभाषी समाज को एकजुट रखने लिए भारत की राष्ट्रभाषा,राजभाषा हिंदी में कवि सम्मेलन गुरद्वारों में करवाते थे।

वह लेखक समाज को देश के कोने-कोने में सुप्रसिद्ध गुरुद्वारों में सपरिवार  साहित्यिक यात्राओं पर लेकर जाते थे।गुरुद्वारों का इतिहास, सिक्ख समाज का देश में योगदान और साहित्यिक परंपरा को जीवित रखने का यह उनका मैराथन प्रयास था।

ऐसे ही एक यात्रा का मैं भी भागीदार बना।

बात करीब 4- 5 वर्ष पहले की है।जोबन जी का फोन आया कि इस बार साहित्यिक यात्रा हिमाचल के सुप्रसिद्ध पाउटा साहिब में दो दिवसीय कार्यक्रम होगा।सभी साथियों को सूचित करो।कई मित्रों से बात की।

इंद्रलोक मस्जिद के पास बसें खड़ी हुईं।हम सब सुबह निकल पड़े।दोपहर में पहला पड़ाव ऐतिहासिक पानीपत में पड़ा।वहां के एक सुप्रसिद्ध गुरुद्वारे का दर्शन और उसी में भोजन की व्यवस्था थी।यह जोबन जी का संयोजन ही था कि उनका काफिला जिधर से गुजरता उधर रास्ते में पड़ने वाले गुरुद्वारे वहां के सामाजिक संगठन सबके स्वागत के लिए तत्पर रहते।

हिमाचल में हम सबको गुरुद्वारे से अलग रुकने की व्यवस्था थी।पुरुषों और महिलाओं के कक्ष अलग थे।सारी व्यवस्था पहले से तय थी।हम लोगों को सुप्रसिद्ध पाउंटा साहिब गुरुद्वारे में ले जाने और छोड़ने के लिए बस की व्यवस्था,वहां भोजन (लंगर प्रसाद ) की व्यवस्था ,सब योजनाबद्ध ढंग से थी।यह जानकर आश्चर्य हुआ कि वहां देश के कोने - कोने से कविगण आकर पहले से ही रुके हुए हैं। उन्हीं कवियों में एक थे उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ से आए डॉ.संगम लाल त्रिपाठी 'भंवर ' जी।

मेरे गृह जिले रायबरेली का पड़ोसी जिला प्रतापगढ़ है सो गांव की माटी का जुड़ाव स्वाभाविक था।कवि दरबार का मंच संचालन ' भंवर ' जी के हाथों में ही था।कवि दरबार बहुत ही रोचक था।देर तक चला।देश के कोने - कोने से आए कवियों को सुना। सबके लहजे और आंचलिक बोली से विरासत में मिली टोन बेशक अलग थी लेकिन भाव और स्थान एक ही था,वह था दशमेश गुरु का स्थान,उनकी रचना स्थली पाउंटा साहिब गुरुद्वारे का सभागार।

हम युवा मंडली ने वहां एक नियम तोड़ा।वह यह था कि रात में गुरद्वारे के लंगर में भोजन प्रसाद न खाकर एक होटल में खाने चले गए।मित्र संदीप तोमर और मेरठ से आई यास्मीन मूमल को बाहर खाना ही ठीक लगा। मैं भी भागीदार बना।यह रोचक और विचित्र प्रसंग फिर कभी संदीप और यास्मीन से संबंधित संस्मरण में लिखूंगा।आज सिर्फ जोबन जी पर बात होगी।

हम लोग होटल से खाना खाकर देर से पहुंचे।जोबन जी बेसब्री से हमारी प्रतीक्षा कर रहे थे।मुझे लगा कि कार्यक्रम का नियम और सामूहिकता भंग करने के कारण वह हम लोगों पर बरस पड़ेंगे लेकिन वह हास्य - व्यंग्य में मुझ भगवाधारी,लाल झंडा बरदार संदीप तोमर और हरे रंग को पसंद करने वाले समुदाय से आने वाली यास्मीन को मजाक - मजाक में धोने लगे।यह तिकड़ी उनसे कन्नी काटकर अपने -अपने कमरे में चली गई। मैंने तो सिर दर्द का बहाना लिया और देर रात्रि तक चलने वाली चर्चा को चादर के अंदर ही मुंह ढककर सुनता रहा।किसी ने मुझे छेड़ते हुए कहा -

"हाफ चढ्ढी वालों को फुल पैंट तक पहुंचने में नब्बे साल लग गए।"

मुझसे न रहा गया।मैं चादर फेंककर बैठ गया।सभी हंसने लगे। उन सबने मेरे सोने के नाटक को पकड़ने के लिए जानबूझकर यह प्रसंग छेड़ा था।जोबन जी हंसकर बोले -

"ठंड रख भाई,ठंड रख।हंसी मजाक को सीरियस मत लिया करो।"

मैंने कहा -

"हिमाचल में वैसे ही इतनी ठंड  पड़ रही है,और ठंड नहीं रखनी।निमोनिया हो जायेगा"इस बात देर तक ठहाके गूंजते रहे।

दूसरे दिन तड़के उठे।सुबह से ही कई कार्यक्रम निश्चित थे। एक कार्यक्रम गुरुद्वारा दर्शन का भी था।इस कार्यक्रम में मुझे उस ऐतिहासिक गुरुद्वारे का ऐतिहासिकता का बोध हुआ।यह वह ऐतिहासिक स्थान था जहां नायन जाते समय गुरुजी के घोड़े के पैर स्वतः ही रुक गए थे।कहते हैं कि वह 17 वैशाख ,संवत 1742 (1685ई.)को यहां पहुंचे थे।घोड़े के पैर को पाओ और टीले को मिलाकर पांवटा शब्द बना और यही प्रसिद्ध हुआ।दशमेश गुरु ने अपने जीवन के साढ़े चार वर्ष यहां बिताए थे।यहीं रुककर उन्होंने योजना बनाई और बाइसधार राजाओं तथा फतहशाह के विरुद्ध युद्ध का नेतृत्व किया।

यहीं पर उन्होंने दशमग्रंथ की रचना प्रारंभ की।उनकी साहित्य साधना में कल - कल बहती यमुना जी बाधा डालती थीं।उन्होंने अपने तपोबल से यमुना के वेग को वहां पर शांत किया और उनके तट पर बैठकर साहित्य साधना की।उन्होंने यहीं पर बहुत से साहित्य का सरल भाषा में अनुवाद भी करवाया।

पूर्णमासी की रात को विशेष कवि दरबार लगाया जाता था। 52 भाषाओं - बोलियों के कवि उसमें भाग लेते थे।गुरुजी के इस कवि दरबार के सामने दिल्ली के मुगलों का दरबार भी फीका लगने लगा था।सारे गुणी - विद्वान यहां आने लगे थे।

गुरुद्वारे में पवित्र श्री तालाब और श्री दस्तर स्थान भी है।इस स्थान पर गुरुजी पगड़ी बांधने की प्रतियोगिता करवाते थे।इस गुरुद्वारे में गुरुजी के हथियार और उनकी वह कलम रखी है जिससे उन्होंने यहां पर साहित्य की रचना की थी।इस स्थान को शस्त्र और शास्त्र का संगम भी कह सकते हैं।दशमेश गुरु के हथियारों और कलम को मैं बड़ी देर तक मुग्धभाव से देखता रहा।मन कह रहा था कि सीसा खोलकर सिर्फ एक बार इस कलम को अपने हाथों से छू लूं।किंतु नियम के बंधनों और सुरक्षा सेवादारों की तीखी नजरों के सामने विवश था।

जोबन जी का इस स्थान में कवि दरबार लगाने का कारण अब समझ में आया था।हम सब बहुत गौरवांवित महसूस कर रहे थे।गुरुद्वारे के प्रबंधकों के द्वारा प्रमाणपत्र और प्रतीक चिन्ह आदि वितरण के बाद एक और विशेष कार्यक्रम था।वह यह कि गुरुद्वारे के अंदर सभी कवियों को सरोपा भेंट करने का।यह ग्रंथी जी और कमेटी द्वारा दिया गया किसी को विशेष सम्मान होता है।

सभी कवियों को सरोपा भेंट करने के क्रम में सिर पर रूमाल बांधकर सभी कवियों ने माथा टेका और भगवा अंगवस्त्र ग्रहण किया।मुझे आशंका थी कि बहुत से मुस्लिम कवि मित्र कहीं माथा टेकने और भगवा अंगवस्त्र लेने मना न कर दें।लेकिन सबने गुरु का सम्मान किया।

हमने इरफान अहमद राही,यास्मीन और लखनऊ से आए प्रसिद्ध शायरों के साथ भगवा अंगवस्त्र डालकर जब एक साथ फोटो खिंचवाया तो विशेष प्रसन्नता का अनुभव हुआ।कोई एक स्थान या एक विचारबिंदु तो ऐसा होना ही चाहिए जहां सभी अपने - अपने जाति - धर्म,मजहब,विचारों की सीमा रेखा से आगे आकर एकत्र हों।भगवा रंग सचमुच सब पर बहुत फब रहा था।

इस अनुभूति के लिए हम सब जोबन जी के आभारी थे।किंतु वह यात्रा को अंतिम चरण तक ले जाने को योजना में व्यस्त थे।सबका हिसाब करना,सबका यथोचित सम्मान करके विदा करना और रुके हुए कवियों के नाश्ते,भोजन व आवास की चिंता करना,सब उनके ऊपर था।उनकी बहू और परिवार के सदस्य भी साथ थे लेकिन तब मैं उन्हें पहचान नहीं पाया था।

वापसी में सबने चलती बस में खूब कविताएं सुनाई।भाई नीतीश तिवारी का गुरुग्राम से आए कई साथियों से परिचय हुआ।राजस्थान से आईं कवियित्री श्रीमती आशा पांडेय ओझा जी को खूब सुना गया।कोई पहाड़ियों और पेड़ों की फोटोग्राफी में व्यस्त था तो कोई खेत - खलिहानों को देखकर प्रफुल्लित हो रहा था।महानगरीय जीवन और व्यस्त समय की आपाधापी से निकलकर यह प्रवास हम लोगों में नई ऊर्जा भर गया।नए मित्रों से मिलकर हमारे व्यक्तित्व को विस्तार मिला।हम सभी को वर्ष में एक बार अवश्य किसी धार्मिक या ऐतिहासिक स्थान को देखना चाहिए।ऐसे स्थलों का प्रवास बच्चों के मन में अपना अमिट प्रभाव छोड़ता है।

खैर,इस सफल कार्यक्रम से लौटकर हम सबने इस साहित्यिक यात्रा को संस्मरण के रूप में लिखकर जोबन जी द्वारा संपादित साहित्यिक पत्रिका में छपने के लिए भेजने का वायदा सबने किया था।मुझे नहीं मालूम कि किसने लिखा,किसने भेजा।लेकिन मैं नहीं भेज पाया था।जिसकी भरपाई आज कर रहा हूं,आज चलते समय जब सोनू ने मुझे रोककर पिताजी की स्मृतियों को सहेजने की बात कही तो मुझे लगा कि जोबन जी मुझे उसी वायदे की याद दिलवा रहे हैं।इस संस्मरण को और अधिक संशोधित करके आगामी पुस्तकों में छपवाने का प्रयास रहेगा।

बाद में कई गोष्ठियों में जोबन जी को बुलाया।श्री जय सिंह आर्य जी ने उन्हें "इंद्रप्रस्थ साहित्य भारती,दिल्ली " का सदस्य बनाया तो उन्होंने सहर्ष हामी भर दी।भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय द्वारा आयोजित कवि सम्मेलनों में भी उनसे भेंट हुई।उनका मजाकिया लहजा और मजाक-मजाक में कोई गंभीर बात कह जाना उनकी आदत थी।वह मुझे परिवारदार होकर भी ' अकेला ' लिखने और मैं उनके घुटनों में दर्द रहने के बावजूद ' जोबन' लिखने पर चिकोटी काटता। मैं कहता कि अपने उपनाम को सार्थक करते हुए मैं तो अकेले ही आया हूं,अकेले ही जाऊंगा तो वह हंसकर कहते -

"बेटे, तेरे पीछे जो काफिला चलेगा वह तुझे अकेला कहलाने देगा क्या?मेरी रचनाएं और सबको जोड़ने के प्रयास कभी बूढ़े नहीं होंगे ,कभी नहीं मरेंगे।कोई न कोई जवान अपना जोबन (जवानी)इस काम में झोंकेगा।इसका मुझे पूर्ण विश्वास है।"

आज उनके वह शब्द,उनका वह विश्वास मुझे झकझोर रहा है।

आज स्व.सुरजीत सिंह ' जोबन ' जी जिस लोक में हैं निश्चित ही वहां का दरबार आप जैसे कवि को पाकर धन्य हो गया होगा।आप वहीं से अपने परिवार और हम जैसे अपने शुभचिंतकों और प्रसंशकों को आशीर्वाद दें कि आपका जोबन हम सबमें समाहित होकर अपने देश - धर्म और साहित्य को जोड़ने की दिशा में कार्य करता रहे।


संवाद-दाता - डॉ.अखिलेश द्विवेदी 'अकेला' की रिपोर्ट  

 

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