तुलसी विवाह पर काव्य संध्या और सारस्वत सम्मान

 

रिपोर्टर- अभय द्विवेदी

5 नवंबर,दिल्ली - माता तुलसी-विवाह के अवसर पर प्रज्ञा लोक साहित्य संस्थान के तत्वाधान में कुंवर सिंह नगर,दिल्ली में काव्य संध्या का आयोजन किया गया।इस अवसर पर लखनऊ से पधारे छंद शिल्पी और शायर श्री भूपेंद्र सिंह 'शून्य ' जी का सारस्वत सम्मान किया गया।कार्यक्रम की विशिष्ट अतिथि श्रीमती पूनम सिमौर थीं और अध्यक्षता पूर्व शिक्षा अधिकारी श्री आर पी सिंह ने की।कुशल संचालन सुप्रसिद्ध कवि श्री संजय जैन ने किया।

कार्यक्रम का शुभारंभ सुप्रसिद्ध समाजसेवी और साहित्य प्रेमी श्री बृजेश गर्ग और श्री राजेश मिश्रा ने दीप प्रज्वलित करकेकिया।

मां सरस्वती की वंदना वरिष्ठ कवियित्री श्रीमती अनीता गर्ग के मुखार बिंदु से हुई।

प्रथम कवि के रूप में आए बाल कवि श्री अंश द्विवेदी ने वीर रस की कविता पढ़ते हुए देशद्रोहियों को चेतावनी देते हुए कहा -

"अब सुधरोगे या बंदूक उठाऊं

देरी नहीं लगाऊंगा।

पहन बसंती चोला यारों

वंदे मातरम गाऊंगा।

बिस्मिल और अशफाक बुलाऊं

नहीं करूंगा चूक।

भगत सिंह की तरह मैं भी बोऊंगा बंदूक।।"

उनके आंगिक संप्रेषण और छोटी उम्र में प्रभावी प्रस्तुतीकरण से सभी श्रोता प्रभावित हुए और राष्ट्रीय गीतकार श्री जय सिंह आर्य 'जय ' जी ने पांच सौ रुपए का नगद पुरस्कार देकर बाल कवि की हौंसला आफजाई की।

वरिष्ठ कवियित्री श्रीमती राजरानी भल्ला ने प्रेम पर कविताएं पढ़ीं तो पूरा सदन तालियों से गूंज उठा।अपनी कविताओं व शायरी से सुविख्यात कवि श्री संजय ' घायल ' और श्री गुस्ताख हिंदुस्तानी ,श्रीमती एकता सिंह चौहान ने खूब तालियां बटोरीं।श्रीमती उर्वी ' ऊदल ' ने गीत के माध्यम से अपने मायके लखनऊ की गलियों को याद किया तो सबकी आंखों के सामने मानों लखनऊ सजीव हो उठा हो। कवि श्रेष्ठ श्रीपाल जी ने भी सबको प्रभावित किया।

वरिष्ठ कथाकार - उपन्यासकार डॉ.अखिलेश द्विवेदी 'अकेला ' ने छोटे किसानों की व्यथा सामने रखते हुए बेटी के ब्याह के लिए साहूकार से कर्ज लेने पर यह पक्तियां पढ़ीं -

"गिरवी रख आया खेतों को

मरता क्या न करता है।

बेटी विदा हुई किशना की

रो - रो आहें भरता है।।

अब अपने ही खेतों में मजदूरी किशना - हरखू करते हैं।

अपनी धरती पाने खातिर

हाड़तोड़ श्रम करते हैं।।

वह नित रोकर धरती चूमें

समझो उनके कर्ज को।

समझो उनके दर्द को।।"

तो देर तक सभागार तालियों से गूंजता रहा।

देश में विशेष अंदाज में काव्यपाठ के लिए पहचाने जाने वाले वरिष्ठ कवि श्री संजय जैन ने देशभक्ति पर मार्मिक गीत का पाठ किया।सीमा पर लड़ते हुए एक वीर सैनिक का शव जब उसके घर आता है तो घर के प्रत्येक सदस्य और समाज की कैसी स्थिति होती है ,इसका सजीव चित्रण गीत के माध्यम से इतनी प्रभावी शैली में हुआ कि करुण रस से सरोबार होकर कवि सहित सभी श्रोताओं की अश्रुधारा बह उठी।

कवियों और कविताओं के पारखी देश भर में भ्रमण करने वाले जाने-माने राष्ट्रीय गीतकार डॉ.जय सिंह आर्य जी ने तुलसी माता पर बहुत सुंदर गीत पढ़ा।उन्होंने कहा -

"जब मुस्काती है तो यह दिल भी मुस्काता।

जब मुरझाती है तो यह दिल भी मुरझाता।।

सदा मेरे घर में मुस्काना तुलसी मां।

हर मौसम में साथ निभाना तुलसी मां।"

उनकी यह पक्तियां सुनकर सभी श्रोता भक्ति भाव से भर गए।श्रोताओं की मांग पर उन्होंने अपना पुराना गीत "रुक जा रुक जा ए मनिहार,चूड़ी मैं भी पहनूंगी "भी सुनाया।उनके इस गीत पर बहुत देर तक तालियां बजती रहीं।

अंत में जिनके सम्मान में काव्य संध्या रखी गई थी ऐसे वरिष्ठ और शानदार शायर श्री भूपेंद्र सिंह ' शून्य ' ने बताया कि वह पहले "होश " के नाम से लिखते थे।लोग उन्हें लखनवी के नाम से भी पुकारते हैं।उन्होंने जिंदगी का फलसफा बताते हुए कहा -

"जिंदगी मोम सी पिघलती है

तब तजुर्बे की शम्मा जलती है।

फिक्र में यह उरोज लाती है

कौन कहता है कि उम्र ढलती है।।"

उनकी शायरी और हिंदी के गीत सुनकर बार - बार सुनाने की फरमाइश की गई।सभी कवियों ने मिलकर उनका सारस्वत सम्मान किया जिसमें उन्हें माला,शाल और प्रतीक चिन्ह भेंट किया गया।

अंत में वरिष्ठ लेखक और समाजसेवी डॉ.अखिलेश द्विवेदी ने सभी कवियों और श्रोताओं का धन्यवाद व्यक्त करते हुए उन्हें जलपान के लिए आमंत्रित किया।


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