शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद के शिष्यों को हिरासत में लिया गया: संगम क्षेत्र में सदियों पुरानी संत स्नान परंपरा बाधित

 

प्रयागराज में चल रहे माघ मेला 2026 के दौरान एक विवादास्पद घटना ने पूरे सनातन समाज को झकझोर दिया है। ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती के शिष्यों को पुलिस ने हिरासत में लिया और उनके रथ (पालकी) को जबरन संगम क्षेत्र से बाहर कर दिया गया। यह घटना मौनी अमावस्या के पवित्र स्नान के दौरान हुई, जब सदियों से चली रही संतों की स्नान परंपरा को बाधित किया गया। क्या यह सनातन धर्म की रक्षा का तरीका है? आइए इस घटना की गहराई में उतरते हैं और समझते हैं कि क्या हुआ, क्यों हुआ और इसका क्या प्रभाव पड़ सकता है।
घटना का विवरण: 18 जनवरी 2026 को माघ मेला के प्रमुख स्नान पर्व मौनी अमावस्या पर स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती अपने शिष्यों के साथ पालकी पर सवार होकर संगम स्नान के लिए निकले थे। उनके शिविर से संगम तट तक का सफर सामान्य रूप से शुरू हुआ, लेकिन पुलिस ने भीड़ और सुरक्षा कारणों का हवाला देकर उन्हें रथ से उतरकर पैदल जाने को कहा। शिष्यों ने इसका विरोध किया, जिसके बाद पुलिस और शिष्यों के बीच धक्का-मुक्की हो गई। पुलिस ने लगभग 35 शिष्यों को हिरासत में लिया, जिनमें से कुछ को पीटने के आरोप भी लगे हैं। स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने आरोप लगाया कि उनके बुजुर्ग संन्यासियों को जूतों से मारा गया और एक नेपाली संत के बाल पकड़कर पीटा गया।
घटना के बाद शंकराचार्य ने अपने शिविर के सामने धरने पर बैठकर प्रशासन से माफी की मांग की। वे बोले, "हमें मारने की कोशिश की गई, लेकिन हम सनातन की रक्षा के लिए अड़े रहेंगे।"
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स (पूर्व ट्विटर) पर इस घटना की वीडियो और पोस्ट वायरल हो गईं, जहां कई यूजर्स ने इसे सनातन धर्म पर हमला बताया। एक पोस्ट में कहा गया, "शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद जी के शिष्य संतों को हिरासत में लिया गया और रथ को जबरन बाहर किया गया। सदियों पुरानी परंपरा बाधितयह कैसा राम राज्य है?"
यह घटना सिर्फ एक झड़प नहीं है, बल्कि इसके पीछे शंकराचार्य की पदवी पर लंबे समय से चल रहा विवाद भी है। स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को उनके गुरु स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती के निधन के बाद 2022 में ज्योतिष पीठ बद्रीनाथ का शंकराचार्य बनाया गया था। हालांकि, यह नियुक्ति सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है, और माघ मेला प्राधिकरण ने उन्हें नोटिस जारी कर 24 घंटे में अपनी पदवी साबित करने को कहा।
प्रशासन का कहना है कि कोर्ट के फैसले तक कोई भी ज्योतिष पीठ का शंकराचार्य नहीं बन सकता। स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के शिविर पर 'शंकराचार्य' लिखा होने पर आपत्ति जताई गई। स्वामी ने इस पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा, "हिंदू कायर हैं, मुसलमान धन्य हैं... क्योंकि वे एकजुट होते हैं।" उन्होंने प्रशासन पर दोहरे मापदंड का आरोप लगाया, कि कुछ संतों को विशेष सुविधाएं दी जा रही हैं जबकि दूसरों को रोका जा रहा है।
इस घटना ने सनातन धर्म के अनुयायियों में गहरा आक्रोश पैदा कर दिया है। एक्स पर कई पोस्ट्स में इसे सनातन की रक्षा के नाम पर अपमान बताया गया। एक यूजर ने लिखा, "ये कैसा अमृत काल जहां शंकराचार्य का अपमान हो और कुछ बाबाओं को सम्मान?"
राजनीतिक दलों ने भी प्रतिक्रिया दी। समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के नेताओं ने इसे सरकारी दमन बताया, जबकि भाजपा ने सुरक्षा कारणों का हवाला दिया।उत्तराखंड के संत समाज ने भी विरोध जताया और घटना की निंदा की।
 स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा, "पुलिस ने हमें भगदड़ में मारने की कोशिश की, लेकिन हम नहीं डरेंगे।" उन्होंने सीसीटीवी फुटेज दिखाने की चुनौती दी।
 सनातन धर्म पर प्रभाव:सनातन धर्म में कुंभ और माघ मेला जैसे आयोजनों में संतों का स्नान एक पवित्र परंपरा है, जो आदि शंकराचार्य के समय से चली रही है। संगम पर रथ या पालकी से स्नान जाना संतों की गरिमा का प्रतीक है। इस परंपरा को बाधित करना केवल धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाता है, बल्कि सनातन की एकता पर सवाल उठाता है। क्या प्रशासन की यह कार्रवाई सुरक्षा के नाम पर है या राजनीतिक दबाव का नतीजा? स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद राम मंदिर आंदोलन में सक्रिय रहे हैं, लेकिन हाल के वर्षों में कुछ मुद्दों पर सरकार की आलोचना भी की है। यह घटना सनातन समाज को सोचने पर मजबूर करती है कि क्या सनातन की रक्षा के नाम पर संतों का अपमान हो रहा है?
माघ मेला 2026 की यह घटना एक चेतावनी है कि धार्मिक परंपराओं का सम्मान किया जाना चाहिए। स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का धरना जारी है, और वे माफी के बिना शिविर में नहीं लौटेंगे। सनातन समाज को एकजुट होकर ऐसी घटनाओं का विरोध करना चाहिए। क्या यही सनातन की रक्षा है? समय बताएगा, लेकिन इतना तय है कि ऐसी घटनाएं धार्मिक सद्भाव को प्रभावित कर सकती हैं।

 

 

 

 

 

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