रजनी
ढौंडियाल जोशी एक ऐसी महिला
हैं जिनकी कहानी संघर्ष, समर्पण और सेवा की
मिसाल है। उत्तराखंड के सुदूर पिछड़े
क्षेत्र राठ थलीसैंण में जन्मी यह बेटी आज
"शिक्षा से शिखर तक"
एनजीओ की संस्थापक निदेशक
हैं, जो हजारों बच्चों
और महिलाओं के जीवन में
रोशनी बिखेर रही हैं। भारतीय रेड क्रॉस सोसाइटी मुख्यालय, नई दिल्ली और
डॉ. आरएमएल अस्पताल की आईसीसी समिति
की सदस्य के रूप में
उनकी भूमिका समाज को मजबूत बनाने
में महत्वपूर्ण है। उनकी जिंदगी की कहानी हर
उस व्यक्ति के लिए प्रेरणा
है जो सपनों को
हकीकत में बदलना चाहता है। आइए जानते हैं उनकी भावुक और मोटिवेशनल यात्रा
को, जो महिला सशक्तिकरण,
शिक्षा और सामाजिक न्याय
की दिशा में एक मील का
पत्थर है। 2 अप्रैल 1985 को
उत्तराखंड के थलीसैंण में
जन्मी रजनी ढौंडियाल जोशी का बचपन पहाड़ों
की हरी-भरी वादियों में बीता। उनकी मां लक्ष्मी ढौंडियाल आरघर वन देहरादून से
प्रिंसिपल के रूप में
रिटायर हुईं, जबकि पिता केशवानंद ढौंडियाल राष्ट्रीय इंटर कॉलेज थलीसैंण से संस्कृत और
हिंदी के प्रवक्ता के
रूप में सेवानिवृत्त हुए। परिवार शांतिकुंज हरिद्वार से जुड़ा था,
जहां सेवा कार्यों का माहौल हमेशा
बना रहता था। रजनी बताती हैं, "बचपन से ही मैंने
माता-पिता को अनाथ और
गरीब बच्चों की शिक्षा, शादियां,
संस्कार जैसे कार्यों में समर्पित देखा। यह देखकर मेरे
दिल में सेवा की ज्योति जली,
जो आज मेरी जिंदगी
का मार्गदर्शक है।"यह भावुक यादें
रजनी को हमेशा प्रेरित
करती रहीं। उनकी प्रारंभिक शिक्षा थलीसैंण में हुई, जबकि मास्टर ऑफ हिंदी की
डिग्री उन्होंने डीएवी देहरादून से प्राप्त की।
2006 में शादी के बाद नोएडा
में बस गईं, जहां
2008 में बड़ी बेटी पावनी जोशी का जन्म हुआ।
2009 में स्वास्थ्य मंत्रालय में नौकरी शुरू की, लेकिन 2012 में दूसरी बेटी के जन्म के
बाद पारिवारिक कारणों से इस्तीफा दे
दिया। नौ सदस्यों के
संयुक्त परिवार में रहते हुए भी उन्होंने अपनी
पढ़ाई नहीं छोड़ी और 2014 में इग्नू से मास्टर ऑफ
सोशल वर्क (एमएसडब्ल्यू) में प्रथम स्थान प्राप्त किया। यह उपलब्धि उनकी
जिद्द और मेहनत की
गवाही देती है। 27 जुलाई 2015 को
रजनी ने "शिक्षा से शिखर तक"
एनजीओ की नींव रखी,
जो आज शिक्षा, महिला
सशक्तिकरण और सामाजिक जागरूकता
का प्रतीक बन चुका है।
घर के आसपास की
झुग्गियों में गरीब बच्चों को पढ़ाने से
शुरू हुई यह यात्रा आज
हजारों जीवन बदल चुकी है। रजनी कहती हैं, "रातों को सोचती थी
कि जीवन में क्या किया? स्वयं के लिए जीना
कोई जीना नहीं। इसी जुनून ने मुझे आगे
बढ़ाया।" पिछले 9 वर्षों में उन्होंने मानसिक और आर्थिक संघर्षों
का सामना किया, लेकिन कभी हार नहीं मानी।एनजीओ के माध्यम से
वे प्राथमिक शिक्षा का ज्ञान प्रदान
करती हैं, साथ ही डांस, डिफेंस
ट्रेनिंग, पर्सनैलिटी डेवलपमेंट, मेहंदी, सिलाई और कंप्यूटर क्लास
चलाती हैं। महिला सशक्तिकरण पर जोर देते
हुए उन्होंने अमर उजाला के अपराजिता कार्यक्रम
के जरिए दिल्ली-एनसीआर में 1.5 लाख से अधिक महिलाओं
और लड़कियों को आत्मरक्षा की
ट्रेनिंग दी। स्वच्छ भारत अभियान, शिक्षा के बाजारीकरण के
खिलाफ जागरूकता, कोरोना काल में जरूरतमंदों की मदद, आर्थिक
रूप से कमजोर परिवारों
को राशन वितरण, ड्रग एडिक्शन की काउंसलिंग, बस्तियों
में अधिकारों की जागरूकता और
POCSO एक्ट पर अभियान – उनकी
गतिविधियां अनगिनत हैं।कोरोना महामारी में उनकी टीम धरातल पर उतरकर खाद्य
सामग्री, इलाज और वैक्सीनेशन में
मदद करती रही। आज भी 70 बच्चे
एनजीओ से जुड़कर प्राथमिक
शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं,
जबकि हजारों बच्चे स्कूलों में अच्छे अंकों से पास हो
रहे हैं। रजनी का मंत्र है,
"एक पढ़ेगा तो दस को
पढ़ाएगा, तभी देश साक्षर कहलाएगा।" उत्तराखंड के सरकारी और
सुदूर विद्यालयों में शिक्षा सामग्री वितरण और स्वास्थ्य शिविरों
का आयोजन भी उनकी प्राथमिकताओं
में शामिल है। रजनी ढौंडियाल जोशी की सेवा कार्यों
के लिए राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंचों
पर अनेक सम्मान मिले हैं। वे वर्तमान में
"शिक्षा से शिखर तक"
एनजीओ की संस्थापक और
अध्यक्ष हैं, साथ ही राष्ट्रीय ब्राह्मण
महासभा की उपाध्यक्ष, अंतरराष्ट्रीय
भगवा सेना की उपाध्यक्ष, रोटरी
क्लब ऑफ वैशाली की
मीडिया प्रभारी, देवभूमि स्पोर्ट्स महाकौथिग फाउंडेशन की मीडिया प्रभारी,
पश्चिमी उत्तर प्रदेश महिला व्यापार मंडल की उपाध्यक्ष, उत्तरांचल
भ्रातृ सेवा संस्थान की सदस्य, ABVIMS अटल
बिहारी वाजपेयी आयुर्वेदिक संस्थान और डॉ. राम
मनोहर लोहिया अस्पताल की आईसीसी कमेटी
सदस्य, तथा रेड क्रॉस सोसाइटी हेडक्वार्टर की आईसीसी कमेटी
सदस्य हैं। उनका पता 4C/469 वार्तालोक अपार्टमेंट, वसुंधरा, गाजियाबाद है। रजनी का सबसे बड़ा
सपना है एक ऐसा
विद्यालय बनाना जहां हर गरीब बच्चा
मुफ्त शिक्षा प्राप्त कर सके। वे
कहती हैं, "आर्थिक तंगी, गलत संगत, नशा और बड़े परिवार
शिक्षा की राह में
बाधा हैं। इन्हें दूर करने के लिए हमारी
टीम निरंतर कार्यरत है।" सीएसआर के माध्यम से
कंपनियां अब उनके साथ
जुड़ रही हैं, जो उनके मिशन
को और मजबूत बनाएंगी।
उनकी कहानी बताती है कि अगर
दिल में जज्बा हो, तो पहाड़ जैसी
चुनौतियां भी पार की
जा सकती हैं।रजनी ढौंडियाल जोशी की जीवन यात्रा
हमें सिखाती है कि सेवा
से बड़ा कोई धर्म नहीं। उनकी भावुक कहानी हर महिला को
प्रेरित करती है कि सपनों
को जीना है, तो संघर्ष से
डरना नहीं। यदि आप भी महिला
सशक्तिकरण, शिक्षा जागरूकता या सामाजिक सेवा
में योगदान देना चाहते हैं, तो "शिक्षा से शिखर तक"
एनजीओ से जुड़ें और
एक बेहतर भारत का निर्माण करें।
रजनी जैसी महिलाएं ही हमारा असली
शिखर हैं!