वर्तमान
समय विश्व इतिहास के उन दौरों
में से एक है,
जब मानव सभ्यता अभूतपूर्व वैज्ञानिक प्रगति और तकनीकी सामर्थ्य
के शिखर पर खड़ी है।
परंतु यही सामर्थ्य यदि विवेक और मानवीय मूल्यों
से नियंत्रित न हो, तो
यह विकास के साथ-साथ
विनाश की संभावनाओं को
भी जन्म दे सकता है।
आज विश्व के कई शक्तिशाली
देशों और उनके नेताओं
के हाथों में ऐसी शक्ति है, जो मानवता के
भविष्य की दिशा तय
करने में निर्णायक भूमिका निभा सकती है।
इतिहास
हमें सिखाता है कि शक्ति
का वास्तविक अर्थ प्रभुत्व या भय पैदा
करना नहीं है, बल्कि उसका सही उपयोग सृजन, संरक्षण और विकास में
निहित है। जब शक्ति का
प्रयोग स्वार्थ, संघर्ष और वर्चस्व की
मानसिकता से किया जाता
है, तब युद्ध, अशांति
और असंतुलन की स्थितियाँ पैदा
होती हैं। लेकिन जब वही शक्ति
मानव कल्याण, शांति और सहयोग की
भावना के साथ प्रयुक्त
होती है, तब समाज और
विश्व नई प्रगति की
ओर अग्रसर होता है।
आज
के समय में विश्व समुदाय अनेक चुनौतियों से जूझ रहा
है—जलवायु परिवर्तन, आर्थिक असमानता, सांस्कृतिक टकराव, आतंकवाद और वैश्विक अस्थिरता
जैसी समस्याएँ मानवता के सामने गंभीर
प्रश्न खड़े कर रही हैं।
इन
परिस्थितियों में यह अपेक्षा स्वाभाविक
है कि विश्व नेतृत्व
अपनी ऊर्जा और कौशल को
विनाशकारी योजनाओं में लगाने के बजाय विकास
और मानव कल्याण की दिशा में
लगाए।
लोकमत
की शक्ति आज पहले से
कहीं अधिक प्रभावशाली हो गई है।
जागरूक नागरिक और वैश्विक संवाद
किसी भी शक्ति-केन्द्र
को यह याद दिलाते
हैं कि सत्ता का
उद्देश्य केवल शासन करना नहीं, बल्कि समाज की भलाई सुनिश्चित
करना है। जब जनता शांति,
विकास और मानवीय मूल्यों
के पक्ष में खड़ी होती है, तब सत्ता के
निर्णयों की दिशा भी
बदलने लगती है।
वास्तव
में मानव सभ्यता का भविष्य इसी
बात पर निर्भर करता
है कि हम अपनी
बुद्धि, प्रतिभा और संसाधनों का
उपयोग किस दिशा में करते हैं। यदि यह शक्ति युद्ध
और विनाश के साधन बनाने
में लगेगी, तो मानवता का
अस्तित्व ही संकट में
पड़ सकता है। लेकिन यदि यही शक्ति शिक्षा, विज्ञान, पर्यावरण संरक्षण, स्वास्थ्य और वैश्विक सहयोग
के लिए समर्पित होगी, तो एक संतुलित
और समृद्ध विश्व का निर्माण संभव
है।
विश्व
के शक्तिशाली देशों के नेताओं और
बुद्धिजीवी वर्ग के सामने आज
एक बड़ी जिम्मेदारी है। उन्हें यह समझना होगा
कि विश्व की मानवता के
विनाश को रोकने के
लिए अपनी शक्ति का उपयोग कमजोर
और पिछड़े पड़ोसी देशों को समृद्ध बनाने
में किया जाना चाहिए। यदि सैन्य शक्ति, आर्थिक शक्ति और बौद्धिक शक्ति
से संपन्न देश अपने संसाधनों और क्षमताओं को
सहयोग, विकास और साझेदारी की
भावना से प्रयोग करें,
तो विश्व में असमानता और संघर्ष की
स्थितियाँ काफी हद तक कम
हो सकती हैं।
आज आवश्यकता
इस
बात
की
है
कि
विश्व
के
प्रभावशाली
राजनेता,
राष्ट्राध्यक्ष
और
बुद्धिजीवी
वर्ग
आगे
आएँ
और
विध्वंसक
विचारधाराओं
तथा
युद्धोन्मादी
नीतियों
को
रोकने
के
लिए
ठोस
पहल
करें।
यदि
समय
रहते
यह
प्रयास
नहीं
किए
गए,
तो
विश्व
मानवता
के
सामने
एक
ऐसा
विध्वंसक
खतरा
खड़ा
हो
सकता
है,
जिसे
रोक
पाना
अत्यंत
कठिन
होगा। इसलिए समय का संदेश स्पष्ट
है—मानव
की
शक्ति,
प्रतिभा
और
संसाधनों
को
विनाश
के
मार्ग
पर
नहीं,
बल्कि
युग-निर्माण,
सहयोग
और
विश्व
मानवता
की
समृद्धि
के
लिए
समर्पित
किया
जाए।
यही
मानवता
की
सच्ची
सेवा
और
भविष्य
की
सुरक्षा
का
मार्ग
है।
(लेखक उत्तराखंड विद्यालयी शिक्षा विभाग में शिक्षक एवं सामाजिक सरोकार से जुड़े हैं)
लेखक
~ डॉ. मुरली मनोहर भट्ट
उत्तरकाशी
(उत्तराखंड)